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जब नहीं था साबुन और सर्फ तब कैसे की जाती थी कपड़ों की सफाई, क्या लगाकर नहाते थे लोग?

आज के समय में हमारे बीच सर्फ और साबुन के कई प्रकार और ब्रांड मौजूद है। जिसका इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है। लोग अपने शरीर और कपड़े दोनों को साफ करने के लिए सर्फ और साबुन का इस्तेमाल करते हैं। अब तो आयुर्वेदिक साबुन और सर्फ भी मार्केट में मिलने लगे हैं। इसकी बिक्री भी बड़े पैमाने पर होती है। लोग अपने पसंद और आर्थिक स्थिति को देखते हुए इनकी खरीदारी करते हैं और इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आपको यह पता है कि पुराने जमाने में जब सर्फ और साबुन नहीं हुआ करता था तो लोग अपने कपड़ों की सफाई कैसे किया करते थे?

शायद यह बात हम और आप में से बहुत कम ही लोगों को मालूम होगी? चलिए इसके बारे में इसके विस्तार से जानते हैं। आपको बता देना चाहता हूं कि भारत में पहला साबुन अंग्रेज लेकर आये थे। अंग्रेजों द्वारा पहला आधुनिक साबुन 1890 के दशक में भारत लाया गया। उसके बाद यहां साबुन की फैक्ट्री खोली गई।

लोगों ने करीब 130 साल पहले भारत में अंग्रेजों द्वारा ब्रिटेन से लाए गए साबुन का इस्तेमाल करना शुरू किया। सबसे पहले लीवर ब्रदर्स इंग्लैंड नामक कंपनी ने साबुन को आम लोगों के लिए भारत के बाजारों में उतारा। उस दौरान साबुन ब्रिटेन से भारत आयात किया जाता था। लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जाता था। बहुत दिनों के बाद भारत में भी इसकी फैक्टरी लगाई गई जहां पर नहाने और कपड़े धोने वाले साबुन का उत्पादन किया जाता था।

भारत में साबुन बनाने वाली पहली कंपनी नॉर्थवेस्ट सोप कंपनी थी यह विदेशी कंपनी थी जिसने 1897 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में सबसे पहला साबुन बनाने वाला कारखाना लगाया। इस कारखाने के लगाने के बाद नॉर्थवेस्ट सोप कंपनी काफी मुनाफे में रही। इस दौरान बड़े पैमाने पर लोग साबुन की खरीदारी करने लगे। उसके बाद टाटा कंपनी की नींव रखने वाले महान शख्स जमशेदजी टाटा भी इस बिजनेस में कूद पड़े। जमशेदजी टाटा ही पहले ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने भारत में साबुन बनाने की पहली भारतीय कंपनी स्थापित की।

लेकिन देश में साबुन आने से पहले भी लोगों के कपड़े धुलते थे और साफ दिखते थे। साबुन के बिना भी लोग नहाया करते थे और उनके उनकी त्वचा स्वस्थ रहा करती थी। वह कैसे होता था, चलिए इसके बारे में जानते हैं?

आपको और हमें यह मालूम है कि भारत में मसालों की खेती बहुत बड़े पैमाने पर होती है। इन्हीं मसालों में एक मसाले का इस्तेमाल कपडे धोने के लिए किया जाता था। इस मसाला का नाम ‘रीठा’ है। पुराने जमाने में बड़े पैमाने पर रीठा के पेड़ पाए जाते थे। राजा और महाराजा अपने उद्यान में भी इस पेड़ को लगाया करते थे।

वहीं जंगलों में या फिर अन्य लोगों के घरों के आसपास भी रीठा के पेड़ पाए जाते थे। लोग रीठा के फल का इस्तेमाल कपड़े को साफ करने के लिए किया करते थे। यह आसानी से उपलब्ध हो जाता था। रीठा में एक नहीं कई गुण मौजूद हैं। जिसका पुराने जमाने के लोग पूरा पूरा फायदा उठाते थे। रीठा से कपड़े धोने से जहां वह चमकदार हो जाते थे तो वही उनके कीटाणु भी मर जाते थे। इतना ही नहीं रीठा बाल धोने के लिए भी काम में लिया जाता है।

Ritha

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज भी रेशमी वस्त्रों को साफ करने के लिए और उन्हें कीटाणु रहित करने के लिए ऑर्गेनिक प्रोडक्ट के रूप में रिठा का इस्तेमाल होता है। रीठा से शैंपू का निर्माण भी होता था। पुराने जमाने में रानियों के बाल बहुत लंबे होते थे, इस दौरान शैंपू नहीं होते थे लेकिन शैंपू की जगह रीठा का इस्तेमाल करके वह अपने बालों को लंबा और घना रखा करतीं थीं। रीठा से बालों को धोने के बाद उनकी चमक और उनकी मजबूती बरकरार रहती थी। इस वजह से ही उनके बाल लंबे और घने हुआ करते थे।

रीठा के अलावा पुराने जमाने में कहीं-कहीं पर गर्म पानी में उबालकर भी कपड़ों को धुला जाता था और उसके कीटाणुओं को मारा जाता था। पहले के लोग अपने कपड़े को गर्म पानी में डालकर उबाल देते थे। फिर उसको गर्म पानी से निकालकर ठंडा कर देते थे। फिर उसे पत्थरों पर रगड़ कर साफ करते थे। अभी भी बड़े धोबी घाटों में इसी तरीके से कपड़ो को साफ किया जाता है। वहां सर्फ का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

पहले के लोग अपने शरीर की गंदगी को हटाने के लिए राख और मिट्टी का भी इस्तेमाल करते थे। पहले शरीर की त्वचा स्वस्थ रखने के लिए लकड़ियों की राख और मिट्टी का इस्तेमाल भी किया जाता था। नहाने के दौरान लोग राख से अपने शरीर को रगड़ते थे या मुल्तानी मिट्टी का लेप लगाकर अपने शरीर को ठंडक प्रदान करते थे। वही भारत में अभी भी कहीं कहीं बड़े पैमाने पर बर्तनों की सफाई के लिए राख का इस्तेमाल किया जाता है।

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