सऊदी सुधार से पुरे अरब की होगी बेहतरी, इस ऐतिहासिक फैसलें से जरुर बदलेगी देश की तस्वीर

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एक सऊदी मौलवी गरजे कि महिलाओं को कार चलाने की इजाजत देने से अनैतिकता फैल जाएगी। दूसरे ने कहा कि आधा दिमाग होने के कारण महिलाएं कार चलाने लायक नहीं हैं। एक ने तो विज्ञान का सहारा लिया कि ड्राइविंग से उनकी ओवरी को नुकसान पहुंचेगा। आखिरकार ऐसी बकवास को दरकिनार कर 24 जून को सऊदी महिलाओं को ड्राइविंग की अनुमति मिल गई। यह मुक्ति की दिशा में उनका पहला कदम है। पढ़ने या पर्यटन के लिए विदेश जाने के फैसलों में ‘संरक्षक’ के रूप में पुरुषों की भूमिका खत्म करने जैसे फैसले भी होने ही चाहिए।

लेकिन, ड्राइविंग की अनुमति इस विचार के लिए बहुत बड़ा धक्का है कि महिलाओं के दमन से ही इस्लाम के प्रति निष्ठा व्यक्त होती है। यह क्रांति सड़क से नहीं आई है, बल्कि शहजादे मुहम्मद बिन सलमान के महल से निकली है। सिनेमाघर खुल गए हैं, सार्वजनिक रूप से संगीत प्रस्तुति हो रही है और मौज-मस्ती में विघ्न डालने वाली पुलिस सड़कों से नदारद है। सामाजिक उदारता अर्थव्यवस्था को कच्चे तेल से दूर ले जाने की शहजादे की महत्वाकांक्षा का हिस्सा है। लेकिन, ये बदलाव घर में अधिक तानाशाही और विदेश में विवेकहीन फैसलों के साथ आए हैं।

दुनिया उम्मीद ही कर सकती है कि बर्बर शहजादे पर उनके ही साहसी स्वरूप की जीत हो। पश्चिम के लोग सऊदी अरब को बिल्कुल पसंद नहीं करते। वे वहां की शरिया सजाओं और महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार से स्तब्ध रह जाते थे और इसके इस्लाम के वहाबी रूप से घबराते थे, जिसने इस्लामी स्टेट जैसे कुछ बहुत ही खूनी जेहादी विचारधाराओं का पोषण किया है। सऊदी अरब में खूब पैसा होने के बाद भी बिज़नेसमैन रियाद की बजाय दुबई में काम करना पसंद करते। अन्य अरब प्राय: सऊदियों को धनी, आलसी और अहंकारी कहकर उनका मजाक उड़ाते।

सऊदी अरब की नियति में दुनिया का बहुत-कुछ दांव पर लगा हुआ है। यह सबसे बड़ा तेल निर्यातक है और इस्लाम के दो पवित्रतम स्थान वहीं हैं। यह खाड़ी, अरब क्षेत्र और इस्लामी विश्व का केंद्र है। सुधारों की सफलता इस अराजक क्षेत्र में स्थिरता लाएगी और अर्थव्यवस्था में रौनक। सऊदी अरब अपने सामान्य रूप में इस्लामी जगत को अपने उदाहरण से नरम बनाएगा और जेहादी तत्वों पर पेट्रो-डॉलर का प्रवाह घटने से भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। लेकिन, सुधार विफल होने पर खाड़ी में उथल-पुथल मच जाएगी, जिसने 2011 के अरबी वसंत की उथल-पुथल को टालने में कामयाब पाई थी।
सऊदी अरब के सामने जटिल समस्याएं भी हैं।

सरकार की 80 फीसदी आय तेल की उठती-गिरती आमदनी पर निर्भर है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत के बाद भी देश सबसे बड़े बजट घाटे का सामना कर रहा है। स्वास्थ्य व शिक्षा में चाहे उपलब्धियां हों पर दशकों से प्रति व्यक्ति जीडीपी स्थिर है। सऊदी लोग ज्यादातर आरामदेह सरकारी नौकरियां करते हैं।तेल से मिली संपत्ति ने दयनीय रूप से अनुत्पादक अर्थव्यवस्था को छिपा लिया और दुनियाभर में इस्लामी कट्‌टरपंथ को फैलाया।

शहजादे मुहम्मद को श्रेय है कि उन्होंने बदलाव की जरूरत समझी लेकिन, विदेश में वे विवेकहीन साबित हुए हैं। यमन के शिया अतिवादी गुट हौथिस के खिलाफ लड़ाई पश्चिमी सहयोगियों के लिए शर्मिंदगी का कारण बनी है। अपने मुख्य सहयोगी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ मिलकर यह कतर को जमीन, समुद्र और हवाई लिंक बंद करके अलग-थलग करने में लगा है। अब तो वह एक नहर खोदकर कतर को जमीन से अलग कर द्वीप बनाने पर तुल गया है।

यह तो हुई विदेश की बात, स्वदेश में उन्हें दमन में मजा आने लगा है। मौत की सजाएं बढ़ गई हैं। असहमति व्यक्त करने वाले अधिक लोग जेल में हैं, जिनमें मजे की बात है कि वे महिलाएं भी हैं जिन्होंने ड्राइविंग के लिए आंदोलन चलाया था। शहजादे ने यह राय भी बना ली है कि सारे ही इस्लामवादी, जिनमें मुस्लिम ब्रदरहुड के अहिंसक गुट भी शामिल हैं, सुन्नी जेहादियों व शिया उग्रवादियों जितने ही खतरनाक हैं। खेद है कि अमेरिका ने भी उन्हें खुली छूट दे दी है।
साभार: The Economist
इनपुट: DBC


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