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क़तर सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठक से ठीक एक दिन पहले श्रम क़ानूनों में सुधार का फ़ैसला किया है.

इसके तहत क़तर में काम करने वाले मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी की न्यूनतम दर तय की जाएगी.
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में क़तर में काम कर रहे भारतीय मजदूरों समेत अन्य आप्रवासी मजदूरों की स्थिति को लेकर क़तर सरकार की निंदा हो चुकी है.
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन भी क़तर को आप्रवासी मजदूरों का शोषण बंद करने की चेतावनी दे चुका है.
क़तर में क़रीब सात लाख भारतीय काम करते हैं जो वहां की कंपनियों में बड़े पदों पर नौकरी से लेकर कंस्ट्रक्शन उद्योग में मज़दूरी कर रहे हैं.
इनमें से लगभग आधे दक्षिण भारत के केरल राज्य से हैं.

क़तरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कंफेडरेशन के महासचिव शरन बुरो ने क़तर के इस फैसले को ‘असली सुधार’ बताया है.
 
श्रम सुधार से मजदूरों को फ़ायदा होगा?
क़तर सरकार दिसंबर 2016 में कफाला सिस्टम को ख़त्म कर चुकी है जिसके तहत कामगारों को नौकरी या देश छोड़ने से पहले अपनी कंपनी से इजाज़त लेनी होती थी.

क़तरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इसके बाद अब क़तर ने नए श्रम सुधारों का एलान किया है.
इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कंफेडरेशन के मुताबिक़ क़तर सरकार ने अपने श्रम क़ानून में ये बदलाव किए हैं.

  • सभी कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी (चाहे वे किसी भी नस्ल के हों)
  • कंपनियां कामगारों को क़तर छोड़ने से नहीं रोक पाएंगी
  • कामगारों के पहचान पत्र कंपनियों की जगह सरकार जारी करेगी
  • एक केंद्रीय संस्था सभी कामगारों को कॉन्ट्रेक्ट के तहत मिलने वाली सुविधाओं पर नज़र रखेगी

क़तर और अरब देशों के बीच राजनयिक संकट के दौरान क़तर में काम कर रहे मजदूरों ने अपनी चिंताएं जाहिर की थीं.

मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

इसके साथ ही मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने साल 2016 में आरोप लगाया था कि क़तर में 2022 के फ़ीफ़ा विश्वकप के लिए बनाए जा रहे स्टेडियम में मजदूरों का शोषण हो रहा है और उनसे जबरन काम कराया जा रहा है.
एमनेस्टी के मुताबिक, मज़दूरों को न केवल गंदी जगहों पर रहन को मजबूर किया गया बल्कि भर्ती के लिए भी उनसे भारी फीस वसूली गई और उनकी तनख्वाह-पासपोर्ट ज़ब्त कर लिए गए.
 
एमनेस्टी ने दक्षिण एशिया के 231 आप्रवासी मजदूरों से बात की. इनमें 132 स्टेडियम और 99 स्पोर्ट्स कॉम्पलैक्स में काम कर रहे थे.
ख़लीफ़ा स्टेडियम में धातु का काम करने वाले एक भारतीय मजदूर ने एमनेस्टी को बताया कि उन्हें कई महीनों से वेतन नहीं मिला और जब शिकायत की तो मालिक ने उन्हें धमकाया.

मजदूर ने बताया, “वे मुझ पर चिल्लाए और कहा कि यदि मैंने फिर से शिकायत की तो मैं कभी देश छोड़कर नहीं जा सकूंगा.”

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